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स्वयं के द्वारा स्वयं के लोगों का शोषण*

देश में सरकारों का आना जाना कोई आम बात नहीं है। कर्मचारियों का रिटायरमेंट होना और नई नियुक्ति होना भी कोई आम बात नहीं है। जब भी कोई सरकार निर्वाचित होकर सत्ता में आती है,तो सबसे पहले चुनाव में किए गए वादों को ही भूल जाती है। आम आदमी जब मतदान करता है तो वह लोकतंत्र को पर्व मानकर ही मतदान करता है लेकिन वहीं दूसरी तरफ सत्ता के लोग लोकतंत्र को खिलौना बनाकर खेलने लग जाते हैं तब पीड़ा होती है। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे जय जवान जय किसान की समीक्षा करें तो तीनों सेनाओं का डंका पूरे विश्व में बज रहा है। किसान की बात करें तो शासन और प्रशासन के लोगों के लिए किसान शोषण का प्रमुख जरिया बना हुआ है। एक तरफ भारतीय सेना के जवान बुलंदियों को छू रहे हैं उनका परचम पूरे विश्व में फहरा रहा है तो वहीं किसान की हालत बदहाल होती जा रही है। शासन और प्रशासन के द्वारा लूटा जा रहा है। किसान की आवाज को उठाने वाले भी कुछ तथाकथित राजनीतिक लोग ही होते हैं जो अपने निजी स्वार्थ के लिए किसानों को मुद्दा बनाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। वास्तविक तथा अपने स्वार्थ की लड़ाई किसान स्वयं ही लड़ रहा है। खेती किसानी के सबसे बड़े तीन मुद्दे हैं आवारा पशु, यूरिया और बिजली। इन तीनों ने किसान की हालत बदहाल कर रखी है। आवारा पशुओं के लिए सरकार ने जो भी कड़े कदम उठाए दरअसल में उन सब का लाभ तो प्रशासन के लोग ही ले रहे हैं। किसान को मिल रही है तो बस परेशानी। यूरिया की बात करें तो सरकार भरपूर मात्रा में यूरिया की आपूर्ति कर रही है,लेकिन सरकार के कर्मचारी यूरिया की कालाबाजारी कर किसान को परेशान कर रहे हैं और किसान से ऊंचे दाम वसूले जा रहे हैं जा रहे हैं। बिजली कटौती किसान की प्रमुख परेशानी बनी हुई है। सरकार जब भी किसानों के हित के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देशित करती है तब प्रशासनिक अधिकारी सरकार की एक भी नहीं सुनते और अपनी मर्जी के मुताबिक किसानों को परेशान करते रहते हैं। अपने हित के लिए किसान ने जिस सरकार का चुनाव किया था आज वही सरकार किसानों के हित की बात नहीं कर रही है और निरंतर किसान का शोषण हो रहा है।

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